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देहरादून – प्रदेश के पर्यटन, लोक निर्माण, पंचायती राज, ग्रामीण निर्माण, सिंचाई, जलागम, धर्मस्व एवं संस्कृति मंत्री सतपाल महाराज ने…

देहरादून – मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने संसद भवन, नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से शिष्टाचार भेंट की। मुख्यमंत्री…

भाजपा सरकार ने राष्ट्रपति पद के लिए द्रौपदी मुर्मु को उम्मीदवार बनाया और अब उप-राष्ट्रपति पद के लिए जगदीप धनकड़…

(लेखक-डॉ. वैदिक, भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष हैं) जापान के पूर्व प्रधानमंत्री शिंजो एबे की हत्या पर संसार के…

आया राम और गया राम’  के वीभत्स नृत्य-दल बदल-को रोकने के लिए संसद ने 1985 में 52वें संशोधन  द्वारा सविंधान में दसवीं अनुसूची जोड़ी जिसे 2003 में 91वें संशोधन द्वारा और कठोर बनाया गया। संवैधानिक स्थिति अबयह है कि विधायिका का कोई सदस्य, चाहे वह संसद या राज्य विधानमंडल का सदस्य हो, अपनी विधायी सदस्यता खो देगा यदि वह दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्य घोषित किया जाता है। दसवीं अनुसूची के अनुसार किसी विधायक को अयोग्य ठहराने के आधार हैं- यदि उसने स्वेच्छा से अपने राजनीतिक दल की  सदस्यता छोड़ दी है, या, यदि वह सदन में मतदान के समय अनुपस्थित रहता है या अपने दल के दिशा-निर्देश के विपरीत मतदान करता है। परन्तु संविधान में यह अपवाद है कि यदि विधायक दल के दो-तिहाई या उससे अधिक सदस्य किसी अन्य पार्टी में  विलय करते हैं या नईं पार्टी बनाते हैं तो ऐसी स्थिति में दलबदल-विरोधी कानून लागू नहीं होगा।अयोग्यता के सवाल पर निर्णय के लिँये पीठासीन अधिकारी, अध्यक्ष / सभापति सक्षम होते हैं जिनके निर्णय की, किहोटो होलोहन बनाम ज़चिल्हूऔर अन्य मामलों में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद, 1992,  केवल न्यायिक समीक्षा हो सकती है।   दल-बदल क़ानून एक बार फिर सुर्ख़ियो में है महाराष्ट्र में सत्ताधारी गठबन्धन के एक महत्वपूर्ण घटक शिवसेना में विभाजन की ख़बर को लेकर। एकनाथ शिन्दे, जो शिवसेना के विधायक और मन्त्री हैं, ने दावा किया है कि उनके साथ शिवसेना विधायी…